भारत के राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य क्षमता को कमतर आंकना चीन की भूल

डॉकलाम की स्थिति पूरी तरह से चीन का किया धरा है। ढ़ोकलाम में जहा भारत के इस कदम ने चीन को बिलकुल चौंका दिया है वही भारत की क्षमताओं को कमतर आंकना उसको अपनी भूल लग रही है |

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नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत का कद ऊँचा होना शुरू हो गया था ,उनका विश्व भ्रमण करना,भारत का पक्ष खुद और भारत के दूतावासों के जरीये विश्व पटल पर रखना दरअसल भारत के लिए बहुत ही सकारात्मक रहा और इसी कारन से भारत का प्रभुत्व विश्व में निरंतर बढ़ रहा है, पर एक प्रतियोगी होने के नाते और एक वैश्विक शक्ति बनने की महत्वाकांछा लिए चीन को ये कहा तक रास आता |

जब की मोदी द्वारा शुरू किये गए राजनयिक पहल को विश्व समुदाय ने स्वीकार किया और विश्व में पाकिस्तान को आतंकवाद के प्रायोजक के रूप में स्वीकार किया जाने लगा और सम्पूर्ण विश्व इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने लगा , चीन अपनी शक्तियों का दुरुपयोग अपने सहयोगी और भविष्य के उपनिवेश पाकिस्तान के लिए करने लगा |

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका और इजराइल की सफलतापूर्वक यात्रा के बाद अमेरिका और इस्राइल दोनों ही भारत के साथ आतंक से लड़ने पर सहमत हुए और पहली बार, दुनिया ने नरेंद्र मोदी के सिद्धांत को स्वीकार किया कि आतंकवाद कहीं भी मानव जाति के लिए खतरा है और पाकिस्तान दुनिया भर में आतंकवाद का केंद्र बन गया है। अमेरिका ने आगे बढ़कर घोषित किया कि हिजबुल मुजाहिद्दीन के प्रमुख सईद सलाहुद्दीन एक वैश्विक आतंकवादी हैं।

चीन विश्व समुदाय के इस लक्ष्य के बिलकुल विपरीत खड़ा है और परोक्ष रूप से हमारे पश्चिमी पड़ोस में विख्यात कुख्यात आतंकवादियों के समर्थक का समर्थन करता है और खुले तौर पर पाकिस्तान को भारी रक्षा और वाणिज्यिक निवेश के साथ मिलते हैं। चीन ने पिछले साल जैश-ए-मोहम्मद के मुख्य मसूद अजहर को प्रतिबंध लगाने के लिए भारतीय प्रस्ताव पर वीटो लगा दिया था और भारत के NSG में प्रवेश को भी कई बार रोक चुका है
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चीनी कार्रवाई का समय अब ​​ऐसा दिख रहा है जैसे उस देश में पाकिस्तानी सेवा की पेशकश की जा रही थी, जब दुनिया में बड़े पैमाने पर यह एक दुष्ट राज्य के रूप में देखना शुरू हो रहा है।

एक तरफ पाकिस्तान अपने द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है और आतंकवादिओं को भारत में घुसने के लिए प्रेरित कर रहा है और सहायता प्रदान कर रहा है , दूसरी तरफ चीन भारत पर आग उगल रहा है और पाकिस्तान की असफलताओं को विश्व समुदाय से छुपाने का भरसक प्रयाश कर रहा है |

चीन ने नरेंद्र मोदी के राजनीतिक महत्वकांछाओं को गलत तरीके से समझा है| उसे लगा था कि वह वही पुराना खेलता रहेगा तो वह सीमा पर हमेशा की तरह खेलता रहा है। लेकिन मोदी के शासन काल में भारत अलग है।  लेकिन चीन को भारत को कमतर आंकने की भूल नहीं करनी चाहिए , एक तरफ जहा भारत की सेना देश की सीमाओं को बाहरी और आतंरिक खतरों से रोकने के लिए सक्षम है और सुदृढ़ता से खड़ी है वही देश की सेनाओ को राजनीतिक समर्थन भी मिला हुवा है जिसकी उम्मीद चीन को बिलकुल भी नहीं थी जैसा की उसने पहले देखा था |

देश ने आंख में आँख मिलकर टकराव का जवाब देने का फैसला किया,  भारतीय सेना न केवल भारत घुसपैठियों को वापस धकेल रहा है, परन्तु उसने भूटान को विदेशी आक्रमण के खिलाफ सुरक्षा के लिए बहुत ज़रूरी आश्वासन को कायम रखा है।

यह एक मानसिक दबाव का खेल है जो चीन खेल रहा है। यह अपने पडोसी देशों को अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांछा से दबा कर रखना चाहता है।

यह पाकिस्तान की भारत के खिलाफ हर संभव मदद करना चाहता है क्योकि दक्षिण एशिया में भारत ही एक ऐसा देश है जो चीन की महत्वकांछाओं पर लगाम लगाने में सक्षम है, यह भारत के विकास को धीमा करना चाहता है जो पहले ही चीन से आगे निकल चुका है और दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में उभरी है, जो कि सबसे ज्यादा विदेशी निवेश को आकर्षित कर रहा है, ये सब तबसे शुरू हुवा जबसे मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने |

पिछले तीन वर्षों में, मोदी ने अपनी स्थिति को विश्व नेता के रूप में समेकित किया है। वह इजरायल, रूस और अमेरिका के साथ रणनीतिक गठबंधन का निर्माण कर रहा है।

यहां तक ​​कि रूस, जो एक बार चीन के करीब चल रहा था, आज भारत के साथ एक बड़ा व्यापार और रक्षा साझेदार है, और वाणिज्यिक हितों ने इसे इस देश के लिए सकारात्मक तरीके से निपटारा किया है। चीन संयुक्त अमेरिका, जापान, इसराइल और दक्षिण कोरिया के साथ जुड़ा हुआ संयुक्त सैन्य अभ्यासों से भी बदतर है।

जब चीन ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के माध्यम से पश्चिम एशिया को एक गलियारा खोला था, भारत ने ईरान में चाबहार बंदरगाह के विकास और ईरान, अफगानिस्तान और अरब दुनिया के गढ़ में जोड़ने वाली सड़क लिंक के विकास पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। कई वर्षों से, चीन म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका और मलेशिया की खेती के लिए भारत को घेरने का प्रयास कर रहा है। यह यूपीए सरकार के दौरान इस मिशन में आंशिक रूप से सफल रहा। हालांकि, पिछले तीन सालों में, नरेंद्र मोदी ने इन सभी देशों के साथ मैप को मजबूत किया, मजबूत संबंध स्थापित किया, वास्तव में इन देशों में भव्य चीनी डिजाइनों को भी निराश किया।

तीन सालों में, मोदी विश्व परिदृश्य पर अपना कद स्थापित कर चुके हैं, चीनी नेता शी जिनपिंग ने खुद को बहुत आगे नहीं बढ़ा पाया है। अक्टूबर में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महत्वपूर्ण 1 9वीं राष्ट्रीय कांग्रेस का आयोजन किया जाता है, तो ग्यारह शायद खुद को एक मजबूत नेता के रूप में पेश करना चाहती है जो सत्ता के समीकरण को अपने फायदे में बदल दे। चीन के भारत और उसके सभी पड़ोसियों के साथ अनुचित रिश्ते रहे है। इसमें प्रत्येक देश के साथ एक ही समस्या है जो की सीमा की है और वो समस्या उन सभी के साथ है जिसके साथ यह सीमा साझा करता है।

दक्षिण चीन सागर में इसकी कूटनीति महज एक दिखावा मात्र है , वास्तव में ये चीन की विस्तारवादी नीति का एक हिस्सा रहा है |
एक तरफ जहा मोदी के पद ग्रहण करने के बाद भारत ने चीन के साथ अपने सीमा विवाद को सुलझाने का प्रयास बढ़ाया और शांति के लिए भरसक प्रयास किया, चीन ने हमारे पडोसी मुल्क पाकिस्तान जो कि आजादी के समय से ही हमारे दुश्मन की तरह व्यव्हार करता रहा है उसको हर तरह से भारत के खिलाफ ही सुदृढ़ करने का काम किया है और जम्मू और कश्मीर में अशांति फ़ैलाने में भरपूर सहयोग दिया है, यहाँ तक कि भारत के विरोध के बावजूद  पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर से वन रोड वन बेल्ट परियोजना को ले जाने का काम किया है |

जब से ढ़ोकलाम में भारतीय सेना ने चीन के गलत प्रयासों को विफल किया है, चीन की मीडिया भारत के खिलाफ जहर उगल रही है और तमाम तरीके से युद्ध की धमकी दे रही है , यहाँ तक की वह के थिंक टैंक के लोग और पूर्व और वर्त्तमान राजनयिक भी भारत को 1962 की जंग का किस्सा सुना रहे हैं और फिर से वही परिणाम करने की धमकी दे रहे है लेकिन शायद उन्हें ये भ्रम है की भारत अब 1962 का भारत नहीं रह गया है और ये बात चीन को वर्त्तमान रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने भी याद दिलाई, वही सुषमा स्वराज जी ने भी चेतावनी दी और कहा की भारत चीन के उस प्रयास को कभी सफल नहीं होने देगा जो की उस जगह( तीनो देशों की सीमाओं का मिलन)  के यथास्थिति को बदलने की कोशिश वो कर रहा है और जिससे भारत को खतरा उत्पन्न होगा |

चुकी भारत सिक्किम और ढ़ोकलाम में ऊंचाई वाले स्थान पर स्थित है भारत को चीन पर रणनीतिक बढ़त हासिल है फिर भी अगर चीन के उस प्रयाश को नहीं रोका जाता है तो वो सिलीगुड़ी कॉरिडोर को सीधा निशाने पर ले सकता है जो कि पूर्वोत्तर के राज्यों का एकमात्र जमीनी संपर्क मार्ग है |

जबकि सीमा पर इतना तनातनी का माहौल है, फिर भी भारत कूटनीतिक रास्तो को अपना रहा है , बातचीत से मसले को सुलझाने का प्रयास कर रहा है , सारी औपचारिक मुलाकातों को बढ़ावा दे रहा है और सबमे अपने प्रतिनिधि को भेज रहा है, लेकिन चीन ने अपना अड़ियल रुख कायम रखते हुवे भारत से सेना हटाने तक किसी भी बात चीत न करने का रवैया अपना रखा है, जो की बिलकुल संभव नहीं है |

चुकी भारत के साथ चीन के आर्थिक सम्बन्ध हैं और बहुत हद तक चीन भारत के बाज़ारों पर निर्भर है , तो सबसे बड़ा दर चीन को इस बात का होगा कि भारत के साथ आर्थिक सम्बन्ध बिगड़ने के फलस्वरूप चीन को कुछ हद तक आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ेगा वही भारत के आर्थिक स्थिति पर बहुत असर नहीं पड़ेगा क्योकि चीन के साथ व्यापर घाटा बहुत ज्यादा है |

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इतने के बावजूद भी युद्ध की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता , इसीलिए भारत के साथ साथ इसके सहयोगी देश भी इस मामले पर करीब से नज़र बनाये हुवे हैं और भारत भी अपनी तैयारियों को कमतर रखने के पक्ष में नहीं है , और भारत के नागरिकों को भी इसके लिए तैयार रहना होगा |

जय हिन्द

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