अरे ओ आतंकी , तेरा क्या मजहब — इंसान बन , इंसान

आज कल जम्मू कश्मीर में देशभक्तो की संख्या में जबरदस्त इजाफा हो रहा है, आज फिर बुहरांन के सममजहब समर्थक हमारे देश के सैकड़ो जवानों को घायल कर दिए, दरअसल वो हिंदुस्तान के देशभक्त नहीं.. पाकिस्तानी देशभक्त हैं जो “सफ़ेद हरे झंडे पर चाँद तारे और झांटू लिखावट वाले काले झंडो” को हमारे सरजमीं पर फहराते हुवे बहुत गर्व महसूस करते हैं , बुहरांन जैसे गद्दारो को समर्थन देते हुवे हमारे देशभक्त जवानों पर पत्थर बरसाते हैं, कितना अच्छा लगता है न पाकिस्तान में काफिर कहे जाने वाले दूर के सुहावने ढोल को देख कर हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकी कुत्तो का साथ देते हैं , उनके इशारों पर अपने सीने पर गोली खाते हैं और ये सैयद अली शाह गिलानी , यासीन मालिक और मीरवाइज़ उम्र जैसे पढ़े लिखे चूतियो के इशारों पर चलते हैं, गिलानी के खुद का परिवार तो डॉक्टर टीचर है और शांति की जिंदगी जी रहे हैं और कश्मीर के बेवकूफ मुसलमान इनके इशारे पे गोलियॉ और पत्थर बरसाते हैं, कितने दिमागदार लोग हैं, ये वही उम्र खालिद जैसे लोग हैं जो पढ़ते तो जे एन यू में हैं लेकिन पढ़े लिखे गद्दार हैं , बुहरांन के समर्थन में आज फिर मियां खालिद ने फिर अपने गन्दे मुंह से मल विसर्जन किया है।

मदीना ( जहां आस्तीन के सांपो ने तो आस्तीन को ही डस लिया)  , ढाका, बग़दाद , पेशावर, लाहौर और हज़ारो ऐसे जगह ब्लास्ट हुवे और हज़ारो मुसलमान भी मारे गए… लेकिन फिर भी ये ज़ाकिर नाईक जैसे बकलोल इनको आसमानी किताब के फॉलोवर ही बताते हैं, अरे जब ये खुद आसमानी किताब के फॉलोवर बताते हैं तो फिर लोग कैसे कह देते हैं की आतंक का कोई मजहब नहीं ?

पाकिस्तान का आतंकी पूरी दुनिया के लिए आतंकी है, पाकिस्तान के लिए नहीं, अफगानिस्तान का आतंकी पाकिस्तान के लिए आतंकी है, सीरिया के आतंकी पाकिस्तान सहित पूरी दुनिया के लिए आतंकी हैं, सब के सब जिहादी हैं, अपनी कौम के लिए जान देते हैं और फिर भी आतंक का कोई मजहब नहीं है और भारत के ये माओवादी केवल भारत के लिए ही आतंकी हैं , खुद की थाली में छेद करना जानते हैं।

दया आती है जाकिर नाईक और ऐसे मुस्लिम धर्म गुरुवो पर जो सऊदी में ब्लास्ट होने के बाद भी ये कहते हैं कि वो तो आसमानी किताब का हुक्म मान रहे हैं , अरे अब तक तो ऐसा ही लगता है कि आतंकवाद का कोई न कोई मजहब जरूर है, अरे कारण है भाई , ईसिस के आतंकी कुरान की आयते पूछते हैं तब मारते हैं लेकिन फिर भी लोग कहते हैं कि आतंक का कोई मजहब नहीं , सारे आतंकी संगठन सीरिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान , इराक आदि से ही हैं लेकिन फिर भी आतंक का कोई मजहब नहीं… अच्छा ही है न हो तो लेकिन ” आतंक का कोई मजहब नहीं ” कहने से पहले कम से कम अपने आप में झाँक के खुद से पूछ लो कि खुद को बेवकूफ बनाना कितना अच्छा है।

ये बन्दूक की गोली जितना असर नहीं करती उससे ज्यादा असर तो इस घटिया विचारधारा का प्रवाह करती है , और आतंकियों, तुम जैसे बेवकूफ ऐसी विचारधारा में बह कर जन्नत की चाह में दोजख में भग लेते हो।

इसी क्रम में एक अंजान व्यक्ति Ashish Chhari (जिसका इस ब्लॉग या ब्लॉग ओनर से कोई सम्बन्ध नहीं है ) की पोस्ट को फेसबुक से इम्पोर्ट कर रहा हूँ –

” रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद ईद आयी है। गाँव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं। लड़के सबसे ज़्यादा प्रसन्न हैं। उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर का धन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना ख़ज़ाना निकालकर गिनते हैं और खुश होकर फिर रख लेते हैं। महमूद गिनता है, एक-दो, दस,-बारह, उसके पास बारह सौ हैं। मोहसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह सौ हैं। और सबसे ज़्यादा प्रसन्न है हामिद। वह उन्नीस-बीस साल का भोली सी सूरत का दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप कुछ साल पहले सीरिया भाग गया था isis के लिए लड़ने और वहां वह लड़ता हुआ मारा गया, माँ ने दूसरा निकाह कर लिया, बच्चे पे बच्चे जनती हुयी जाने क्यों पीली होती गयी और एक दिन बच्चा पैदा करती हुयी मर गयी। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना के पास रहता है, उसकी गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। गाँव के ही एक मौलवी साहब जाकिर नाइक ने उसे बताया कि उसके अब्बाजान जन्नत अता फरमाये गए हैं, शराब के दरियाओं में डुबकी लगाते हैं, अलग अलग फ्लेवर वाले झरनों से शराब लेकर पीते हैं, काजू, मेवा, खजूर खाते हैं और 72 हूरों के साथ रात गुजारते हैं, यहां तो वे 2-3 मिनिट में चुक जाते थे लेकिन जन्नत में जितना मर्ज़ी उतने समय में खाली होते हैं। अम्मीजान जहन्नुम में डाल दी गयी है, वहां उनके लिए न शराब है न कबाब और न कोई मर्द, बस दोजख की आग में सेंकी जा रही हैं भुट्टे की माफिक…….. खैर हामिद प्रसन्न है।
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हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है— ‘तुम डरना नहीं अम्माँ, मैं सबसे पहले आऊँगा। बिल्कुल न डरना।’ हज़ार-बारह सौ हामिद की जेब में, हज़ार-पांच सौ अमीना के बटुवे में। साल भर का त्यौहार है। बच्चा खुश रहे, उनकी तक़दीर भी तो उसी के साथ है। बच्चे को खुदा सलामत रखे, ये दिन भी कट जायँगे। गाँव से मेला चला और लड़कों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सबके सब दौड़कर आगे निकल जाते। फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर साथ वालों का इंतज़ार करते। सहसा ईदगाह नज़र आयी।
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सबने ईदगाह पहुँच कर वुज़ू किया और नमाज़ अता की और एक-दूसरे को गले लगाकर ईद की मुबारकवाद दी। तब मोबाइलों, कपड़ों और खाने-पीने की दुकानों पर धावा होता है। सब लड़के हर दूकान पर जाकर मोलभाव कर रहे हैं, अपनी अपनी पसंद की चीजें खरीद रहे हैं, पर हामिद नहीं, हामिद लड़कों की टोली से गायब है, दो-चार घण्टे के बाद अच्छे से खा-पीकर, कपडे, मोबाइल खरीदकर सब वापस चलने को तैयार है, हामिद भी आ चुका है, सब पश्चिम में गिरते सूरज की चाल को समझकर गाँव लौटने लगे हैं…….
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दरवाजे पर हामिद की आवाज़ सुनते ही अमीना दौड़ी और उसे गले से लगाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में एक बोरा देखकर वह चौंकी…..
‘यह बोरा, कहाँ से लिया?’
‘मैंने मोल लिया है।
‘कै रूपये का?’
‘तीन हज़ार दिये।’
‘क्या है इसमें?’

हामिद ने बोरा जमीन पर खाली कर दिया….. अमोनियम नाइट्राइट, बारूद, पोटाश, सल्फर डाई ऑक्साइड, पुरानी जैकेट, कुछ गज मीटर लम्बा कपड़ा, आठ-दस हाथ सूतली, लम्बी नोकदार पीतल की कीलें, कांच के टुकड़े…… अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया। लाया क्या, ये कबाड़! ‘सारे मेले में तुझे और कोई चीज़ न मिली, जो यह कबाड़ उठा लाया।
हामिद ने गर्व के भाव से कहा— “अम्मा मैं काफिरों को मारूँगा, जिहाद पे जाऊँगा, अल्लाह के रास्ते मजहब की खातिर कुर्बान होऊंगा, बम बनाऊगा, सुसाइड जैकेट पे फिट करूँगा, कुछ पेट से भी बांधुगा और किसी एअरपोर्ट, शौपिंग मॉल, मन्दिर, स्कूल में अलाह हू अकबर चिल्लाते हुए खुद को उड़ा लूंगा और काफिरों को मार कर अब्बा की तरह जन्नत जाऊँगा…”

बुढ़िया का क्रोध तुरन्त स्नेह में बदल गया, बच्चे में दीन के लिए कितना त्याग, कितना ‍सद्‌भाव और कितना विवेक है! दूसरों को नया मोबाइल लेते, पिज़्ज़ा बर्गर खाते, मिठाइयां उड़ाते, ब्रांडेड कपड़े खरीदते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? लेकिन मजहब पे सब कुर्बान कर दिया उसने…. वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएं देती जाती थी, अल्लाह ताला से उसके लिए जन्नत में आला मुकाम देने की गुजारिश करती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य खूब समझता…..! ”

क्योंकि वह जन्नत जाने, शराब की नदियों में डुबकी लगाने, अलग-अलग फ्लेवर की शराब पीने और 72 हूरों के साथ सोने के लिए बेकरार था………. ”

बस ऐसे ही होती है दिमाग की दही कश्मीरियों की और वो पत्थर लेकर पिल पड़ते हैं, सही गलत की पहचान क्या है उन्हें, उन्हें तो बस ऐसे ही दिमाग की दही कर के आसमानी किताब का हवाला दे कर आतंकवाद के दलदल में धकेल दिया जाता है, धकेलने वाले का तो कुछ जाता नहीं, वो तो मौज करता है, कौन सा उसे खुद आ कर बंदूक चलानी है, कह दो एक बार गिलानी से, मीरवाइज़ उम्र से, यासीन मालिक से, हाफिज सईद से, जाकिर नाईक से, बगदादी से और तमाम उन लोगो से जो ऐसे काम को करने के लिए आसमानी किताब का हवाला दे कर आतंकवादी बनने को कहते हैं कि खुद क्यों नहीं कुर्बान होते इस्लाम के नाम पर, हमें क्यों धकेल रहे हो, आओ एक बार तुम भी बम बांध कर उड़ जाओ, तुम भी सीने पर गोली खा कर देखो, ऐे आतंकियों और उनको मानने वाले लोगो, एक तुम्हारे कहने उनमे से एक न तैयार होगा, उनकी फट के हाथ में आ जाएगी और उसी दिन से तुम्हारा अभ्युदय होगा।  तुम्हे भी ज्ञान की प्राप्ति होगी और तुम भी ऐसे गन्दी विचारधारा के प्रवाह में नहीं बहोगे।

ऐे बेवकूफो , होश में आओ।

जय हिन्द

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